Tuesday, June 22, 2010

अब बिछुड़ने का मलाल था शायद
वो रिश्तो का दलाल था शायद
उसके हाथों में लगा था खून
हमने सोचा गुलाल था शायद
तेरी खुशबु थी महकी महकी
नींद में तेरा ख्याल था शायद
वो मुझे लगातार देखता ही रहा
आँखों में उसके कोई सवाल था शायद
उसे क्या हाले दिल सुनाऊ मैं
वो खुद ही बेहाल था शायद

3 comments:

राज भाटिय़ा said...

बहुत खुब जी

हरकीरत ' हीर' said...

अब बिछुड़ने का मलाल था शायद
वो रिश्तो का दलाल था शायद
उसके हाथों में लगा था खून
हमने सोचा गुलाल था शायद

वाह .....बहुत खूब ....!!

Akshita (Pakhi) said...

बहुत सुन्दर रचना...

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'पाखी की दुनिया' में आपका स्वागत है.